आप कितने धार्मिक है ? और कितने धर्मवान है और कितने हो सकते है ||

जब धर्म की बात करते है | तो किसी विशेष धर्म की बात नहीं करना चाहता , चलिए इसको इसका दायरा बढ़ाते है | कुछ सवालों में बात करेंगे और इनका उत्तर ढूंढने का प्रयास करेंगे |

धर्म क्या है ?

थोडा कर्मकाण्डो से बाहर निकलते है तो पायेंगे धर्म नियति या नियत है | जो लगातार बिना किसी रोक टोक के चला आ रहा है धर्म को परिभाषित नहीं करना चाहिए और ना ही जरुरत है क्यूंकि शब्द के रूप में इसके अर्थ जगह जगह पर बदल जाते है | कुछ आस पास की घटनाओं को लेकर समझने का प्रयास करे कि धर्म का मतलब क्या है ? बरसात के मौसम में बादलो का बरसना, बीजो का अंकुरित होकर पौधे में बदलना-पेड़ बनकर फलो को देना,  ये कुछ भौतिक क्रिया है जो कि लाखो सालो से नियत रूप में चली आ रही है | अपने कर्तव्यो का पालन कर रही है | समय पर इन क्रियाओ में बदलाव देखने को मिलता है, इनकी प्रक्रिया धीमी और तेज़ दोनों होती है , लेकिन इन भौतिक क्रिया का अंतिम लक्ष्य कभी ख़त्म नहीं होता , और ना ही उस लक्ष्य को पाने के तरीके में कोई बदलाव होता है | पौधे हमेशा बीजो के अंकुरण से ही पैदा हो रहे है , बरसात हमेशा बादल ही लेकर आ रहे है | नदिया हमेशा समुद्र में मिलने को बह रही है | इस धरती पर पैदा होने वाला जीव मरने के लिए संघर्ष कर रहा है | प्रकृति के कुछ निश्चित गुणसूत्र है जिनका मनुष्य सदियों से अध्ययन कर रहा है कुछ को समझ पाया है कुछ को समझना चाहता है , कुछ दुष्प्रभाव भीतरी और बाहरी रूप से देख चूका है कुछ को आज भी झेल रहा है , कुछ का हल निकाल चूका है , कुछ आने वाली पीढियों को पहुँचाना चाहता है | प्रकृति में रहने के हिसाब से देखे तो धर्म सदियों से हुए मानवीय अनुभवों का निचोड़ है , ये अनुभव हर किसी को अलग हो सकते है क्यूंकि अनुभव शब्दों में नहीं बाँटे जाते, इनको पैदा किया जा सकता है ,फिर भी हर किसी का अनुभव अलग ही होगा, इसलिए धर्म के परिपेक्ष में एक ही बात कई तरीके से कही जाती है या कहें धर्म को जगह पर अलग अलग ढंग से परिभाषित करने की कोशिश की गयी है | 
थोडा और अगर अपना दायरा बढ़ाते है तो पृथ्वी को मृत्युलोक भी कहा जाता है ? और कई दार्शनिक इसे स्वर्ग भी कहते है | इस पर थोडा आगे चलकर बात करेंगे ,ये दोनों बाते एक दुसरे के उलटी है | क्यूंकि एक बात जहाँ जीवन को समाप्त करने की बात कर रही है तो दूसरी उसके आनंद में डूब जाने की |  लेकिन इस छोटी सी बात से हम निष्कर्ष जरुर निकाल सकते है , धर्म जीवित रहने ,कष्ट रहित रहने ,और आन्दमय रहने के तरीको की एक गणितय पुस्तक है |  जिसको सुन कर नहीं , जी कर सिखा जाता है |

धर्म किसकी बात करता है?

अपनी इंजीनियरिंग के दौरान एक दोस्त से काफी विवाद होता था कि धर्म किसकी बात करता है ?  उस समय पर मेरा मानना था किसी के अनुभवों और विचारो का | जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढाया जा रहा है | मैं किसी देवी देवता ,पंडित ,मोहम्मद ,जीसस, बुद्ध,जैन ,इत्यादि की बात नहीं करना चाहता |क्यूंकि जब हम इनकी बात करते है तो इनसे जुड़े प्रसंग में उलझ कर रह जाते है |
धर्म को समझने के लिए कुछ भौतिक बातो को लिख लेते है |
  • मैं कौन हूँ ?
  • मैं क्यूँ हूँ ?
  • मुझे कौन कण्ट्रोल करता है ?
  • क्या मेरा अंत है ?
  • क्या मैं फिर आऊँगा?
  • मैं कहाँ जाऊँगा ?
अब इसका जवाब  मैकेनिकल मशीन से पता लगाते है सवालों के क्रम में उत्तर लिखते है 
  • कार
  • हमने तुम्हे बनाया या खोजा है 
  • तुम पेट्रोल की उर्जा पर चलती हो 
  • हाँ भी और ना भी
  • कह नहीं सकते (आगे विचार करेंगे क्यूँ ?)
  • दोबरा यहाँ फिर आने के लिए 
 अब अपने मूल प्रश्न पर आते है कि धर्म किसकी बात करता है तो इसका हल है उर्जा | धर्म ,उर्जा की बात करता है , उसके उपयोग की और अधिक कहें तो सदुपयोग की बात करता है |


धर्म की उर्जा ? ये क्या बकवास है |

धर्म ऐसेअसंख्य नेसर्गिक और निश्चित नियमावली को समझाने का प्रयतन करता है जिससे ये मानवरूपी शरीर लगतार चल रहा है | एक बड़ा सवाल उठता है कि धर्म की उर्जा आती कहाँ से है ? इस अखण्ड ब्रह्माण्ड में उर्जा का केवल एक ही स्रोत है वो सूर्य | सूर्य की उर्जा लगभग सभी ग्रहों पर पहुँचती है और सब इसका उपयोग कर रहे है | वहाँ की मिट्टी, हमारे ग्रह की मिट्टी, पौधे ,जीव ,जंतु ,मनुष्य और सब कुछ चाहे वो निर्जीव और चाहे सजीव हो | क्यूंकि ये एक लगातार और निरंतर सालो से चली आ रही एक प्रक्रिया है जिसकी उत्पति कैसे होती है ये पता लगा लेने के बाद उसे बताने वाला भौतिक रूप से नहीं होता है |

अगर धर्म उर्जा है तो हम क्या है ?

धर्म उर्जा है तो हम क्या है ? हम उस उर्जा का प्रयोग कर चलने वाली मशीन से अधिक कुछ नहीं है | क्या आप कह सकते है कि आप बिना उर्जा के रह सकते है ? या आपका कोई अस्तित्व है ? क्या आप बिना उर्जा के जीवित रह सकते है इसका जवाब है नहीं | जब शरीर में उर्जा जनरेटर बंद हो जाता है तो ये शरीर रूपी मशीन कबाड़ के सिवाई कुछ नहीं है | जो उर्जा आपके मॉस में स्टोर है उसे लेने के लिए दूसरी मशीनें हमेशा तैयार रहती है | अगर मानवीय कर्मकाण्डो को इसमें से निकल दे तो , दूसरा जीव आपके शरीर में स्थित बची हुई उर्जा को लेकर चलता बनेगा | 
धर्म केवल हमें चलाने, जिन्दा रखने , घुमने फिरने में मदद करने वाली उर्जा की बात नहीं करता, हमारी मशीन में एक ख़ास बात ये होती है चाहे वो पौधे,जीव,जंतु ,या हम खुद भी , उर्जा को एक ऐसे रूप में बदल देते है जिससे भाव,स्वाद ,इच्छाये और ना जाने क्या क्या जो मानवीय व्यव्य्हार को एक नयी दिशा प्रदान करती है |  यहीं से धर्म की नयी नियमावली की शुरुआत कही जा सकती है | इसको आप जटिल कह सकते है या विस्तृत कह सकते है |
अगर इस उर्जा को धार्मिक उर्जा कहूँ तो जायदा बेहतर होगा ,क्यूंकि ये वो उर्जा है वो जीवो के जटिल व्यवहार को नियंत्रित करती है | या उसे बनाने में एक अहम भूमिका निभाती है |

उर्जा को देखने के तरीके ?

क्या उर्जा को देखने का कोई तरीका हो सकता है ? यदि आपको लगता है कि हो सकता है तो आप कमेंट में बता सकते है |लेकिन उर्जा को देखने का कोई तरीका नहीं होता है | उसे उपभोग करने के तरीके जरुर होते है | सूरज की रौशनी जब तक गर्म नहीं लगती जब तक शरीर पर ना पड़े , ना ही वो दिखाई पड़ती है जब तक किसी से टकरा कर ना आ जाए , ना ही उर्जा सुनाई देती है जब तक उसका प्रयोग बोलने में ना हो, मतलब साफ़ है कि उर्जा चाहे हम भौतिक उर्जा की बात करें या धार्मिक उर्जा की वो विश्वास और महसूस करने की चीज़ है या और जायदा कहें तो करके महसूस करने की चीज़ है | दुसरे के ताप को अनुभव मैं नहीं कर सकता , दुसरे का खाया फल मीठा है या नहीं ,मैं नहीं बता सकता | दूसरा व्यक्ति अपने शरीर की उर्जा का उपयोग कर क्या परिणाम पा रहा है मैं नहीं बता सकता ? उसके परिणाम कितने लाभ दायक होंगे या नहीं | क्यूंकि उसके परिणाम को मैं ग्रहण नहीं कर सकता है | 
धार्मिक उर्जा को आप केवल स्थान्तरित ही नहीं कर सकते बल्कि उसको दुसरे में पैदा भी किया जा सकता है | पैदा करने से मतलब ये नहीं है कि हम एक नयी तरह की उर्जा को जन्म दे रहे है | हो सकता हो कि ऐसा हो या फिर हम किसी पुरानी उर्जा का प्रयोग कर नए तरीको से कर रहे हो |

उर्जा का स्थान्तरण

उर्जा का स्थान्तरण कई तरीको से हो सकता है जैसे इन्द्रियों के द्वारा इस तरह की उर्जा के लिए हम दस तरह की इन्द्रियों का प्रयोग कर सकते है | हर तरह की इंद्री एक अलग तरह की उर्जा का संचयन करती है उसका एक अलग रजिस्टर बनाती है | समय के साथ उसी तरह की उर्जा को इकठ्ठा कर हमारा मस्तिष्क  एक कैप्सूल के रूप में अपनी दराज़ में रख लेता है | एक उदाहरण के साथ समझते है |

एक सेब खाने के लिए आता है | उर्जा का स्रोत है, मुख नामक कर्मेन्द्रि इसको दो हिस्सों में काट कर जिह्वा पर रखती है | यहाँ पर हम कई तरह की सूचनाओ को इकठ्ठा कर सकते है | जैसे सेब मुलायम है , खाने में आसान है , मीठा है , लाल है ,रस से भरा है ......जितनी चाहे उतनी, हमारी क्रमेंद्री और इंद्री दोनों काम बखूबी करती है और ज्यादा से जायदा सूचना इकठ्ठा करती है | असल में सेब के उर्जा को सुचना में बदलती है एक तीक्षण मस्तिष्क जायदा से जायदा उर्जा या सुचना को अपने रजिस्टर में इकठ्ठा करता है और बाद में एक कैप्सूल बना के किसी कोने में रख लेता है | इस पूरी प्रक्रिया में हमारी मशीन के दो हिस्से हो जाते है एक वो जो उर्जा को चलने-फिरने में इस्तेमाल होने वाली है दूसरी वो जो भविष्य में ये बताने के काम आएगी की सेब का सवाद कैसा होता है उससे कितनी उर्जा मिलती है ? क्यूंकि ये एक भावनाओ वाली उर्जा है ये वाद विवाद से स्थान्तरित नहीं होती है | दो आदमियों ने सेब खाया ,दोनों का अनुभव और उर्जा का स्तर अलग अलग होगा |

इंडक्शन

 ये उर्जा को ट्रान्सफर करने का एक और तरीका है बल्कि ज्यादातर लोग अपनी उर्जा को इसी माध्यम से स्थान्तरित करते है | एक व्यक्ति मन मस्तिष्क से स्वस्थ है | मैं ये कहूँगा एक उपजाऊ भूमि है जिसमे सिर्फ बीज बोने है | एक गुरु अपने सारी बौद्धिक उर्जा को इस माध्यम से अगली पीढ़ी में पहुंचाता है | सवाल फिर से वो ही है इस बार भी उर्जा का एकत्रित करने के लिए हमें अपनी दसो इन्द्रियों का प्रयोग करना पड़ेगा | इंडक्शन से हम दुसरे का दिया सारा ज्ञान ग्रहण कर सकते है | उसमे निखार ला सकते है ,उसको अपने पास से दुसरे को दे सकते है इंडक्शन में भी आपके अन्दर उर्जा जो पहले से विद्यमान है उसका रूपांतरण होता है | जैसे गणित का छात्र ,जैसे जैसे गणित में पारंगत होता जाते है उसकी मस्तिष्क में रखे कैप्सूल गणित की सूचनाओं से भर जाते है | ये तो बात हुई ,युद्ध कला सीखने वाला, संगीत सीखने वाला , खाना बनाने वाला , सबके पास अपने अपने उर्जा रजिस्टर होते है |  उर्जा मात्र कुछ विधाओ में पारंगत हासिल कर लेने का नाम नहीं है | इन सब तरह की उर्जाओ के साथ मानवीय व्यवहार के गुण भी लगातर अपना स्वरुप बदलते रहते है हमारा सोचने का तरीका ,समस्याओ को देखने और उनका हल निकालने का तरीका भी लगातार बदलता रहता है |

सेल्फ इंडक्शन

हमें अक्सर ये देखने को मिलता है कि कुछ बच्चे पैदा होते ही विलक्षण गुण लिए होते है | यदि हमारे मन मस्तिष्क में ऐसा को उर्जा का कैप्सूल है जिसे हम किसी भी कारण से उपयोग नहीं कर पा रहे है कई बार वो आने वाली या फिर कई पीढ़ियों में जब ट्रान्सफर होता रहता है जब उस उर्जा का प्रयोग ना हो जाए | ये कोई डीएनए का ट्रान्सफर नहीं और ना ही कोई आनुवंशिक गुण है | कुछ छात्रों में किसी विशेष विषय के प्रति रूचि दिखाई देती है जिसका उसकी कई पीढ़ियों तक सम्बन्ध नहीं होता , लेकिन अचानक ही उसके अन्दर कुछ विलक्षण गुण दिखाई पड़ते है जो सूरज के जैसे होते है | बस इनको निखारना और सवारना ही शायद उसके जीवन का लक्ष्य होता है | ऐसे मस्तिष्ककई बार बिना गुरुओ के मार्ग दर्शन से नए रास्ते बनाने में कामयाब होते है उनके बाद कई पीढियाँ उनके मार्ग पर चलकर नयी ऊँचाइयों को पाती है |

इंडक्शन और सेल्फ इंडक्शन की उर्जा में फर्क


इंडक्शन के द्वारा ली गयी उर्जा वैसे होती है जैसी हमें दुसरे ने दी है , क्यूंकि उर्जा हमारे व्यवहारिक गुणों को प्रभावित करने वाली है ,तो कई बार ये आपसी प्रतिस्प्रधी बना देती है , क्रोध, इर्ष्या जैसे गुणों का उद्गम ऐसी जगह से देखने को मिल सकता है | लेकिन सेल्फ इंडक्शन से पैदा हुई उर्जा को मालुम होता है कि अगर इस जनम में अपनी इच्छा पूरी नहीं करी पता नहीं कब मौका मिलेगा | ऐसी जगह पर करुणा,विनम्रता , आदि के भाव स्वयम ही पैदा होते है | ऐसे व्यक्ति ही दुसरे को ये भाव दे पाते है | 

जन्मो का चक्कर ,असंख्य योनियाँ

धर्मो में इस बात पर विवाद है कि पुनर्जन्म होता है या नहीं होता है | हिन्दू धर्म को छोड़कर, जायदातर धर्म एक जन्म की बात करते है | बुद्ध इस पुर्नजनम को मानते है लेकिन आत्मा का कांसेप्ट वो उस तरह से नहीं मानते जैसे चला रहा है , चलिए इसे उर्जा से समझते है , सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रहमांड में अकेला उर्जा का स्रोत है | सालो से पृथ्वी पर पड रही उसकी किरणों ने युरेनियम जैसे उर्जावान तत्व को जन्म दिया है | सूर्य से पैदा होने वाली उर्जा को हम मात्र,सब्जियों ,फलो, के माध्यम से ले सकते है| आत्मा ही उर्जा का स्वरुप है | या ये कहें की आत्मा ही तो उर्जा है तो हम फलो की आत्मो को ग्रहण कर रहे है |सूर्य असंख्य आत्माओ को ब्रह्माण्ड में भेज रहा है , अलग अलग जीव इन्हें ग्रहण कर अलग अलग स्वरूपों में बदल रहे है | वर्तमान विज्ञान की खाद्य श्रंखला केवल भौतिक उर्जा का ही स्थान्तरण नहीं कर रही बल्कि वो उस आत्मा को मुक्ति के मार्ग पर भी ले जा रही है जहाँ उसे जाना है | आत्मा रूपी उर्जा कैसे एक दुसरे जीव से होते हुई मानव योनि में प्रवेश करती है, और मानव का जीवन ही उसका अंतिम लक्ष्य होता है |क्यूंकि मानव की इन्द्रियाँ ही उसको मिलने वाली उर्जा को नया आकर दे सकती है | जिसका प्रयोग वो अपने निरंतर जीवन में होने वाली परेशानियों से लड़ने में करता है | 



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